सुबह का वक्त है। पहाड़ों पर किसी घर की छत से नीचे रसाई घर में जलते चूल्हे से निकलता धुआं बड़ी ही धीमी गति से ऊपर नीले आकाश में फैलता जा रहा है । दूर कहीं मंदिर की घंटी सुनाई देती है, आँगन में एक औरत पशुओं के लिए चारा तैयार कर रही है और घर के बाहर लकड़ी का पुराना दरवाजा हवा से धीरे-धीरे हिल रहा है।
लेकिन जिस घर में कभी बच्चों की आवाजें गूँजती थीं, आज वहाँ अजीब-सी खामोशी है।
बेटा नौकरी के लिए शहर चला गया, बहू बच्चों की पढ़ाई के कारण उसके साथ रहती है। गाँव में अब बूढ़े माता-पिता ही बचे हैं। त्योहारों पर घर खिलता है, कुछ दिनों के लिए रौनक लौटती है और फिर, वही सन्नाटा।
यह कहानी किसी एक गाँव की नहीं, बल्कि हिमाचल के उन अनेक परिवारों की चिंता को बयाँ करती है, जिनके अपने बेहतर भविष्य की तलाश में घर से दूर जा रहे हैं।
हिमाचल की पुरानी रसोई: चूल्हे से जुड़ी जिंदगी, स्वाद और परंपराएँ
कभी गाँव ही हमारी पूरी दुनिया हुआ करता था, एक समय था जब पहाड़ों के गाँव सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी हुआ करते थे।
सुबह खेतों की ओर जाते लोग, पशुओं की घंटियाँ, स्कूल जाते बच्चे, बावड़ी पर पानी भरती महिलाएँ और शाम को चौपाल में बैठकर बातें करते बुजुर्ग—गाँव की अपनी रफ्तार थी।
लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते थे। किसी के घर शादी हो तो पूरा गाँव मदद के लिए पहुँच जाता। किसी के खेत में काम अधिक हो तो पड़ोसी हाथ बँटा देते। त्योहारों और मेलों में दूर रहने वाले रिश्तेदार भी घर लौट आते।
फिर धीरे-धीरे जिंदगी बदलने लगी।
बच्चे पढ़ने के लिए कस्बों और शहरों में जाने लगे। पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी की तलाश शुरू हुई। गाँव में अगर मनचाहा रोजगार नहीं मिला, तो लोगों ने शिमला, चंडीगढ़, दिल्ली या दूसरे शहरों देशों का रुख किया।
शुरुआत में लगा कि कुछ साल बाहर रहकर वापस लौट आएँगे। लेकिन नौकरी, बच्चों की शिक्षा और शहर की जिंदगी के साथ कई परिवार वहीं बसते चले गए।
पीछे रह गया पुराना घर—जिसकी दीवारों में आज भी परिवार की यादें बसी हैं।
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आखिर क्यों छोड़ना पड़ रहा है अपना गाँव?
गाँव छोड़ने के पीछे हर परिवार की अलग कहानी होती है। कोई मजबूरी में जाता है, कोई बेहतर अवसरों की तलाश में और कोई बच्चों के भविष्य को सँवारने के लिए।
रोजगार की कमी सबसे बड़ी चिंता..
पहाड़ों में रहने वाले युवाओं के सपने भी बड़े हैं। वे अच्छी पढ़ाई करना चाहते हैं, अपने पैरों पर खड़ा होना चाहते हैं और परिवार को बेहतर जीवन देना चाहते हैं।
लेकिन हर गाँव के आसपास पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं होता। खेती और बागवानी से जुड़े अवसर भी जमीन, मौसम, बाजार और लागत पर निर्भर करते हैं। पर्यटन से काम मिलता है, लेकिन कई जगह वह मौसमी होता है।
ऐसे में पढ़ा-लिखा युवा जब देखता है कि उसकी योग्यता के अनुसार काम आसपास नहीं है, तो वह बाहर जाने का फैसला कर लेता है।
यह फैसला हमेशा खुशी से नहीं लिया जाता। कई बार अपने घर, माता-पिता और दोस्तों को छोड़ना आसान नहीं होता। मगर परिवार की जिम्मेदारी और भविष्य की चिंता उसे आगे बढ़ने के लिए मजबूर करती है।
बच्चों की पढ़ाई के लिए बदलना पड़ता है ठिकाना..
कई माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और जीवन में आगे बढ़ें।
छोटे गाँवों में स्कूल मौजूद हो सकते हैं, लेकिन उच्च शिक्षा, विशेष विषयों की पढ़ाई या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बच्चों को बड़े कस्बों और शहरों में जाना पड़ सकता है।
कई परिवार बच्चों को अकेले भेजने के बजाय खुद भी उनके साथ रहने लगते हैं। धीरे-धीरे गाँव का घर खाली होने लगता है।
यहाँ एक सवाल भी उठता है—क्या बेहतर शिक्षा पाने के लिए हर परिवार को अपना गाँव छोड़ना जरूरी होना चाहिए? अगर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और जरूरी सुविधाएँ स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हों, तो शायद कुछ परिवारों के लिए वहीं रहना आसान हो सके।
खेती करना पहले जितना आसान नहीं रहा..
पहाड़ी खेती मेहनत माँगती है। खेत कई बार ढलान पर होते हैं, जमीन छोटी-छोटी होती है और हर काम मशीनों से करना संभव नहीं होता।
इसके अलावा जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान, मौसम की अनिश्चितता, बढ़ती लागत और उपज को बाजार तक पहुँचाने जैसी चुनौतियाँ भी कुछ क्षेत्रों में किसानों को परेशान करती हैं।
जब परिवार के युवा बाहर नौकरी करने लगते हैं, तो खेतों में काम करने वाले हाथ कम हो जाते हैं। बुजुर्गों के लिए पूरी खेती सँभालना मुश्किल हो सकता है।
धीरे-धीरे कुछ खेत खाली रहने लगते हैं। जिन जमीनों पर कभी फसलें लहलहाती थीं, वहाँ झाड़ियाँ उगने लगती हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पहाड़ों में खेती का भविष्य नहीं है। बेहतर बाजार, प्रसंस्करण, आधुनिक तकनीक, बागवानी और स्थानीय उत्पादों के लिए उचित कीमत मिले, तो खेती आज भी कई परिवारों की आजीविका बन सकती है।
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जब घर में बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं और बच्चे दूर..
पलायन की सबसे भावुक तस्वीर उन घरों में दिखाई देती है, जहाँ माता-पिता गाँव में रहते हैं और बच्चे शहरों में।
माँ फोन पर पूछती है, “बेटा, इस बार छुट्टियों में कब आओगे?”
उधर से जवाब आता है, “माँ, काम से छुट्टी मिलते ही आऊँगा।”
कई बार छुट्टी जल्दी नहीं मिलती। कभी बच्चों की परीक्षाएँ आ जाती हैं, कभी खर्चों का हिसाब बिगड़ जाता है और कभी यात्रा में ही कई घंटे लग जाते हैं।
फोन पर बातचीत होती रहती है, पैसे भी घर पहुँचते हैं और जरूरत पड़ने पर बच्चे दौड़कर आने की कोशिश करते हैं। फिर भी साथ बैठकर चाय पीने और सामने बैठकर हाल पूछने की कमी अलग होती है।
यहाँ यह समझना भी जरूरी है कि गाँव में रह रहे बुजुर्गों का जीवन हर जगह एक जैसा नहीं है। कुछ परिवारों में पड़ोसी, रिश्तेदार और गाँव का समुदाय मजबूत सहारा बनते हैं। लेकिन जहाँ घर दूर-दूर हैं और सुविधाएँ सीमित हैं, वहाँ अकेलापन अधिक महसूस हो सकता है।
पलायन का असर केवल खाली घरों पर नहीं, रिश्तों की रोजमर्रा की निकटता पर भी पड़ता है।
क्या सच में हिमाचल के गाँव पूरी तरह खाली हो रहे हैं?
इस सवाल का जवाब थोड़ा जटिल है।
किसी गाँव में कई घर बंद दिखाई देने का अर्थ यह नहीं कि पूरा गाँव खाली हो चुका है। कहीं लोग स्थायी रूप से शहरों में बस गए हैं, तो कहीं परिवार का एक सदस्य बाहर नौकरी करता है और बाकी लोग गाँव में रहते हैं। कुछ लोग समय-समय पर लौटते हैं और खेती या घर की देखभाल में भी योगदान देते हैं।
19 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अमर उजाला की एक रिपोर्ट में हिमाचल के नौ जिलों के नौ गाँवों और 486 परिवारों पर आधारित अध्ययन का विवरण दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, अध्ययन में शामिल लोगों ने रोजगार और शिक्षा को पलायन के प्रमुख कारणों में बताया। अध्ययन में कई लोगों का अपने गाँव लौटते रहना और परिवारों को आर्थिक मदद भेजना भी सामने आया।
यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण संकेत देता है, लेकिन इसके निष्कर्षों को प्रदेश के हर गाँव पर लागू करना सही नहीं होगा। अलग-अलग क्षेत्रों में परिस्थितियाँ अलग हैं।
इसलिए असली सवाल केवल यह नहीं है कि कितने लोग गाँव छोड़ रहे हैं। सवाल यह भी है कि वे क्यों जा रहे हैं, कितने वापस लौटते हैं और गाँव में रहने वालों के लिए जीवन कितना सुविधाजनक है।
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खाली घरों के साथ बदलती जा रही है गाँव की तस्वीर
जब किसी गाँव में परिवारों की संख्या कम होती है, तो उसका असर रोजमर्रा की जिंदगी पर भी दिखाई दे सकता है।
कहीं पुराने घरों की मरम्मत रुक जाती है। कहीं खेतों की देखभाल कम हो जाती है। कुछ जगह स्थानीय दुकानों और दूसरे छोटे कामों के लिए ग्राहकों की संख्या घट जाती है।
गाँव में बच्चे कम हों, तो स्कूलों को चलाने और सुविधाएँ बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ सकती है। हालाँकि ऐसी स्थिति हर गाँव में नहीं है और इसके पीछे दूसरे स्थानीय कारण भी हो सकते हैं।
सबसे बड़ा बदलाव गाँव की सामाजिक जिंदगी में आता है। जिन रास्तों पर कभी बच्चों की टोलियां दिखाई देती थी, वहाँ अब कम आवाजाही होती है। जिन आँगनों में त्योहारों पर खूब चहल-पहल रहती थी, अब वे कई बार साल के कुछ खास दिनों में ही आबाद होते हैं।
पुराने घर केवल पत्थर, लकड़ी और मिट्टी से नहीं बने होते। उनमें परिवार की पीढ़ियों का इतिहास भी होता है। इसलिए उनका बंद होना लोगों को भावनात्मक रूप से भी प्रभावित करता है।
क्या गाँवों में फिर लौट सकती है रौनक..
बिल्कुल, लेकिन केवल लोगों से यह कह देने से कि वे गाँव वापस लौट आएँ, समस्या हल नहीं होगी।
अगर युवाओं को गाँव में सम्मानजनक आमदनी और आगे बढ़ने के अवसर मिलें, तो कई लोग अपने क्षेत्र में रहकर काम करने के बारे में सोच सकते हैं।
स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फल-सब्जियों की खेती, मधुमक्खी पालन, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और जिम्मेदार ग्रामीण पर्यटन जैसे विकल्प मददगार हो सकते हैं। लेकिन इनके लिए प्रशिक्षण, बाजार, परिवहन, पूँजी और सही मार्गदर्शन जरूरी हैं।
इंटरनेट और डिजिटल सेवाएँ भी कुछ लोगों को अपने क्षेत्र से काम करने का अवसर दे सकती हैं। इसके लिए भरोसेमंद कनेक्टिविटी और काम के वास्तविक अवसर चाहिए।
साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, सड़क, सार्वजनिक परिवहन और बुजुर्गों की देखभाल पर ध्यान देना भी जरूरी है। गाँव में रहना तभी आकर्षक बनेगा, जब लोगों को लगे कि वे अपने परिवार के भविष्य से समझौता किए बिना वहाँ रह सकते हैं।
सरकार, पंचायत, स्थानीय संस्थाओं और गाँव के लोगों को मिलकर यह देखना होगा कि किस क्षेत्र में कौन-सी जरूरत सबसे बड़ी है। हर गाँव के लिए एक ही समाधान काम नहीं करेगा।
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अपनी जड़ों से रिश्ता अभी भी बाकी है..
एक अच्छी बात यह है कि गाँव से बाहर रहने वाले सभी लोग अपनी जड़ों को नहीं भूलते।
कई लोग छुट्टियों में घर लौटते हैं। अपने खेतों और मकानों की देखभाल करते हैं। त्योहारों में भाग लेते हैं और जरूरत पड़ने पर गाँव के कामों में मदद करते हैं।
कुछ लोग बाहर काम करने का अनुभव लेकर वापस अपने क्षेत्र में नए अवसर भी तलाशते हैं। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि पलायन और गाँव से रिश्ता टूट जाना एक ही बात नहीं है।
जरूरत इस बात की है कि गाँव से जुड़ाव केवल भावनाओं तक सीमित न रहे। स्थानीय स्तर पर ऐसे अवसर भी बनें, जिनसे लोग अपनी इच्छा से गाँव में रह सकें, लौट सकें या कम से कम अपने गाँव के विकास में योगदान दे सकें।
आखिर में…
पहाड़ों के खाली होते गाँव हमें एक जरूरी सवाल के सामने खड़ा करते हैं—क्या विकास का मतलब केवल गाँव से शहर की ओर जाना है, या ऐसा माहौल बनाना भी है जहाँ इंसान अपने घर के पास रहकर सम्मान और सुविधा के साथ जिंदगी जी सके?
युवाओं का बाहर जाना गलत नहीं है। बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश हर व्यक्ति का अधिकार है। चिंता तब होती है, जब लोगों के पास अपने ही क्षेत्र में अवसर बहुत कम रह जाते हैं और बुजुर्ग अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में अकेले पड़ जाते हैं।
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हिमाचल के गाँवों को बचाने का अर्थ केवल पुराने मकानों को बचाना नहीं है। इसका अर्थ है खेतों को फिर से उपयोगी बनाना, स्थानीय रोजगार बढ़ाना, बच्चों को अच्छी शिक्षा देना और बुजुर्गों को भरोसेमंद सुविधाएँ और अपनों का साथ उपलब्ध कराना।
क्योंकि किसी गाँव की असली पहचान उसके मकानों की संख्या से नहीं, वहाँ बसने वाली जिंदगी से होती है।
और शायद हर पहाड़ी घर के भीतर आज भी एक छोटी-सी उम्मीद बाकी है—कि किसी दिन आँगन में बच्चों की आवाजें फिर गूँजेंगी, चूल्हे पर चाय फिर चढ़ेगी और बंद पड़ा दरवाजा फिर अपने लोगों के लौटने की आहट सुनेगा।

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