हिमाचल के युवा वेटलिफ्टर कल्याण सिंह की जद्दोजहद: स्वर्ण पदकों वाला चैंपियन आज अखाड़ों में लड़ने को मजबूर

                                                 



देवभूमि हिमाचल की पहाड़ियों से निकली प्रतिभाएं हमेशा देश का नाम रोशन करती रही हैं। कठिन हालात, सीमित संसाधन और संघर्ष की लंबी राह के बावजूद कई युवा अपने जज़्बे और मेहनत से नई ऊंचाइयों को छूते हैं। लेकिन कई बार परिस्थितियाँ इतनी कठोर हो जाती हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर चमकने वाली प्रतिभा भी उपेक्षा और आर्थिक तंगी के बोझ तले दब जाती है।

ऐसी ही दर्दभरी कहानी है चंबा जिले के भटियात विधानसभा क्षेत्र की तारागढ़ पंचायत के 21 वर्षीय वेटलिफ्टर कल्याण सिंह की—जिसके हाथों से स्वर्ण पदकों की चमक अभी और बढ़नी चाहिए थी, लेकिन मजबूरी ने उसे मेलों और अखाड़ों की कुश्तियों में धकेल दिया।


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घर की जिम्मेदारियों ने रोक दी उड़ान

कल्याण सिंह के पिता देवराज किसान हैं और परिवार का पूरा गुजर-बसर खेती पर निर्भर है। मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब उनकी मां कौशल्या देवी की दोनों किडनियां फेल हो गईं। उनका इलाज और डायलिसिस जालंधर में चल रहा है, जिसका भारी खर्च उठाना परिवार के लिए बेहद मुश्किल हो गया है।

कल्याण बताते हैं:

"मां की हालत देखकर मन टूट जाता है, लेकिन मेरा सपना अभी भी जिंदा है। मैं देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना चाहता हूं—बस थोड़े सहारे की जरूरत है।"

 

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राष्ट्रीय स्तर पर 7 पदक, जिनमें 5 स्वर्ण—फिर भी मदद नहीं

सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कुल 7 पदक जीते हैं, जिनमें 5 स्वर्ण पदक शामिल हैं।

मुख्य उपलब्धियां

  • जुलाई 2019, समोआ – कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप: रजत पदक

  • जनवरी 2019, पुणे – खेलो इंडिया यूथ गेम्स: स्वर्ण पदक

  • दिसंबर 2018, नागपुर – यूथ एंड जूनियर नेशनल: स्वर्ण पदक

  • दिसंबर 2018, धर्मशाला – जूनियर स्टेट चैंपियनशिप: स्वर्ण पदक

  • मई 2017, हमीरपुर – हिमाचल ओलंपिक: रजत पदक

  • नवंबर 2017, इंदौरा – सीनियर स्टेट: स्वर्ण पदक

  • नवंबर 2015, हमीरपुर – स्टेट लेवल: स्वर्ण पदक

इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद, कल्याण को न तो सरकार से आर्थिक सहयोग मिला और न ही खेल विभाग से डाइट व ट्रेनिंग की सुविधा।


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डाइट और ट्रेनिंग पर हर महीने 50,000 रुपये का खर्च

वेटलिफ्टिंग एक ऐसा खेल है जिसमें शारीरिक फिटनेस, संतुलित आहार और नियमित प्रशिक्षण बेहद जरूरी होते हैं।
कल्याण के अनुसार:

  • एक प्रोफेशनल वेटलिफ्टर पर
    ₹40,000 – ₹50,000 प्रति माह तक खर्च आता है

  • लेकिन अब वे यह खर्च नहीं उठा पा रहे

  • मजबूरी में प्रतियोगिताओं की जगह अब मेलों में कुश्ती लड़ रहे हैं ताकि घर चले

उनके शब्दों में:

"मेहनत की कमी नहीं है। अगर थोड़ा सहारा मिले तो मैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए स्वर्ण ला सकता हूं।"

 


सरकारी घोषणाएँ कागजों में, मदद अब तक नहीं

कल्याण कहते हैं कि जिन प्रतियोगिताओं में उन्होंने पदक जीते, उनके लिए सरकार और विभाग ने कई घोषणाएँ कीं, लेकिन उन वादों का लाभ आज तक नहीं मिला। कई आवेदन देने और अधिकारियों से मिलने के बावजूद उन्हें सहायता नहीं मिली।


स्थानीय लोग भी कर रहे हैं अपील

तारागढ़ पंचायत और भटियात क्षेत्र के युवाओं का कहना है कि सरकार को ऐसे खिलाड़ियों की मदद करनी चाहिए।
उनका कहना है कि:

  • चंबा जैसे दूरदराज क्षेत्रों में सुविधाओं की भारी कमी है

  • प्रतिभाएँ आगे नहीं बढ़ पातीं

  • अगर कल्याण को सही समय पर सहायता मिले तो वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन कर सकता है



विकास की बातें—खिलाड़ियों की अनदेखी

चंबा जिले में विकास की बातें अक्सर सड़कों, सुरंगों और सरकारी योजनाओं तक सीमित रहती हैं। लेकिन जब खेल प्रतिभाओं को सहयोग नहीं मिलता, तो कई कल्याण सिंह जैसे खिलाड़ी संघर्ष में ही खो जाते हैं।

कल्याण में प्रतिभा, ताकत, जज़्बा और सपना—सब कुछ है। बस ज़रूरत है सही मार्गदर्शन और मजबूत सहयोग की।

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